मधुबनी चित्रकला


Madhubani painting on kurta by Smt Rajni Jha
 
Madhubani painting on saree by Smt Rajni Jha

विभिन्न भारतीय पारंपरिक लोककलाओं  में से एक 'मधुबनी चित्रकला'  जिसे मिथिला चित्रकला के नाम से भी जाना जाता है, आज लोकप्रियताके चरम पर है। महिलाओं द्वारा परिधान किये जानेवाली साडियाँ एवं कुरतों के द्वारा मधुबनी चित्रकला भारत के घर घर में पहुँच रही है साथ ही विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ रही है।

मधुबनी चित्रकला बिहार के मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, सहरसा, मुजफ्फरपुर एवं नेपाल के कुछ क्षेत्रों की प्रमुख चित्रकला है। माना जाता है कि ये चित्र राजा जनक ने राम-सीता के विवाह के दौरान महिलाओं से बनवाये थे। आरंभ में मधुबनी चित्रकला केवल महिलाओं द्वारा हि की जाती थी। धीरे धीरे पुरूष भी इसमें सहभागी हुए। 

इसमें देवी-देवताओं के चित्र, प्राकृतिक दृश्य, पेड़ पौधें और विवाह के दृश्य आदि का चित्रण होता है। मधुबनी चित्रकला में प्रयुक्त रंग घरेलू वस्तुओं से बनायें जाते हैं। जैसे हल्दी, केले के पत्ते, लाल रंग के लिए पिपल की छाल आदि। मधुबनी चित्रकला को घर की खास तीन जगहों पर बनाने की परंपरा है जैसे पूजा स्थान, कोहबर कक्ष (विवाहितों का कमरा) और शादी या कोई खास उत्सव पर घर की दिवारों पर। वर्तमान समय में मधुबनी चित्र दिवार, कैनवास, कपड़े, हस्तनिर्मित कागज इत्यादि पर बनायें जाते हैं।

मधुबनी चित्रकला की शैलियाँ 

भरणी शैली : मधुबनी चित्रकला की लोकप्रिय शैली है भरणी। इसमें रंग भरने पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है इसलिए यह चित्र बहुत रंग-बिरंगे होते हैं। रामायण, महाभारत के प्रसंग, राम-सीता, शिव-पार्वती जिन्हें यहाँ योग-योगिणी कहा जाता है, राधा-कृष्ण की कथाएँ आदि मधुबनी चित्रकला के प्रमुख विषय हैं। Enclosed areas को मनभावन जीवंत रंगों से भरा जाता है और मुख्य चरित्रों को काले रंग से रेखांकित किया जाता है।

कचनी शैली: यह मधुबनी चित्रकला की खास पहचान है। आकृतियों को सजाने के लिए महिन महिन लकीरों को एकदम पास पास बनाया जाता है। इसके कई प्रकार हैं जैसे खडी कचनी, तिरछी कचनी, जंजीरा कचनी, लहरी कचनी, दोहरी कचनी आदि। कचनी शैली में अधिकतर ब्लॅक एण्ड व्हाईट चित्र होते हैं। कभी-कभी एक या दो रंगों का प्रयोग किया जाता है। 

कोहबर शैली: वर-वधू के शयनकक्ष को कोहबर कहते है। इसे योग-योगिनी अर्थात शिव पार्वती का निवास समझकर पवित्र माना जाता है। कोहबर शैली के मुख्य विषय प्रेम और समृद्धि हैं। इनमें प्रयुक्त सभी आकृतियों के अलग-अलग कारण हैं। जैसे बांस - वंशवृद्धी, केला - मांसलता, मछली और सुग्ग (parrot)- कामोत्तेजना, सिंह- शक्ति, हाथी और घोड़े- ऐश्वर्य, हंस और मयूर- शांति, सूर्य और चंद्र- दीर्घ जीवन आदि को दर्शाते हैं। 

तांत्रिक शैली: तांत्रिक शैली मधुबनी चित्रकला की सबसे अलग शैली है जो धार्मिक अनुष्ठान, तंत्र-मंत्र और जादूटोणा पर आधारित है। मुंडन, उपनयन, विवाह आदि अवसरों पर अरिपन (भूमिचित्र) तथा भित्तिचित्र दोनों के लिए तांत्रिक शैली का प्रयोग होता है। इसमें पंचमुखी शिव, काली, महादुर्गा आदि चित्र प्रमुख हैं। नयनायोगिनी का चित्र, कोहबर कक्ष के चारों कोनों में आवश्यक होता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि वह वर-वधू को अनिष्ट से बचाती है।

गोदना शैली:  गोदना के बारे में हम सभी जानते हैं कि वह शरीर के अंगों को चित्रों द्वारा सजाने की कला है। मधुबनी चित्रकला में गोदना के चित्रों का प्रयोग सर्वप्रथम चानूदेवी द्वारा किया गया। उन्होंने काजल और बांस की पेन का उपयोग किया था। फूल,पनमा अर्थात पान, पशु पक्षी, तारे, सूर्य, चंद्र इत्यादि कई चित्र बनायें जाते हैं।

मधुबनी चित्रकला को प्रोत्साहन देने के लिए किये गये प्रयास 

 1933 के भूकंप में धराशायी घरों की दिवारों पर अंकित मधुबनी चित्रों से दरभंगा जनपद के सबडिविजनल ऑफिसर डब्लू. जे. आर्चर अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने इस कला के नमूनों को कलाप्रेमियों तक पहुँचाने के भरसक प्रयास किये।

1942 में लंदन आर्ट गैलरी में मधुबनी चित्रों की पहली प्रदर्शनी लगायी गयी।

श्रीमती पुपुल जयकर, जर्मन शोधकर्ता डाॅ. एरिका स्मिथ तथा सेसिल उले ने मधुबनी चित्रकला को शोध का विषय बनाया और प्रबंध प्रस्तुत किये।

फ्रांस के वैक्स वैकुआद ने 'द आर्ट ऑफ मिथिला' नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने इस विषय पर एक रंगीन फिल्म भी बनाई।

मधुबनी चित्रकला को अंतरराष्ट्रीय पहचान देने के लिए जापानी नागरिक हासेगावा का नाम भी उल्लेखनीय है। उन्होंने दुर्लभ मधुबनी चित्रों को संग्रहित करके जापान के तोकामाची शहर में संग्रहालय बनाया। 

पूर्व रेल मंत्री श्री ललित नारायण मिश्र ने जयंती जनता एक्सप्रेस नामक ट्रेन के डिब्बों में मधुबनी चित्रों को लगाया।

दिल्ली में संसद भवन के द्वार पर और पटना रेल्वे स्टेशन पर मधुबनी चित्रकला अंकित है।

बाबासाहब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर की बाहरी दिवारोंको मधुबनी चित्रकला से सुशोभित किया गया है।

अभी हाल ही 2019 में मधुबनी रेल्वे स्टेशन की लगभग सात हजार वर्ग फीट दिवारों को मधुबनी चित्रकला से सजाया गया और यह कार्य स्थानीय कलाकारों ने निशुल्क किया।

मधुबनी चित्रकला का गढ़ माने जाने वाले जितवारपुर गाँव को शिल्पग्राम घोषित किया गया है और यहाँ सभी घरों की बाहरी दिवारों को मधुबनी चित्रकला से सुशोभित करने का प्रयास कीया जा रहा है।

मिथिलांचल को कोसी अंचल से जोड़ने वाले ब्रीज के पास मधुबनी चित्रकला का एक संग्रहालयविकसित किया गया है।

प्रसिद्ध मधुबनी चित्रकार 

मधुबनी चित्रकारों में अधिकतर महिलाएं हैं। इनमें मधुबनी केपास जितवारपुर गाँव की सियादेवी हम प्रमुख रूप से ले सकते है जिन्हें इस क्षेत्र में कई पुरस्कार प्राप्त हैं। जैसे 1969 में बिहार सरकार द्वारा राज्य पुरस्कार, 1981 में पद्मश्री, 1984 में बिहार रत्न, 2006 में शिल्प गुरू आदि। सियादेवी मधुबनी चित्रकला अपने मायके से सिखी थी। ससुराल में उन्होंने कई महिलाओं को मधुबनी चित्रकला सिखाई और व्यवसाय के लिए प्रोत्साहित किया। जैसे यमुना देवी।  सियादेवी की मृत्यु हो चुकी है और उनके पोते उनकी कला का उत्तरदायित्व संभाल रहे है। मधुबनी चित्रकला में पद्मश्री से सम्मानित अन्य महिलाएं हैं - जगदंबा देवी (1975), गंगा देवी (1984), महासुंदरी देवी (2006)  आदि । पुरूष कलाकारों में श्री लालबाबा का नाम अग्रगण्य है। 

मधुबनी चित्रकला का वाणिज्यिकरण

मधुबनी चित्रकला की बढ़ती लोकप्रियता से इसके वाणिज्यिकरण को बढ़ावा मिला है। बाज़ार की जरूरतोंको ध्यान में रखते हुए इस कला के परंपरागत रूप में संशोधन किए गये। नैसर्गिक रंगों की जगह कृत्रिम रंगोंने ले ली जिससे काम आसान हो गया। दिवारों और जमीन के बदले  काग़ज और कपड़े पर चित्र बनाने की वज़ह से वे टिकाऊ बने साथ ही उन्हें स्थानांतरित करना आसान हो गया। इन सभी कारणों से मधुबनी चित्रकला की व्यावसायिक संभावनाएं बढ़ गई।

हम यह कह सकते हैं कि मधुबनी चित्रकला के माध्यम से एक भारतीय लोक-संस्कृति परिलक्षित हो रही है। सांस्कृतिक एवं व्यावसायिक दृष्टि से, मधुबनी चित्रकला की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढती हुई लोकप्रियता, भारत की समृद्धशाली कला की परिचायक है।
                
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